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Tuesday, August 15, 2017

जो भी देगा रब देगा : देवमणि पांडेय की ग़ज़ल


देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

जो भी देगा, रब देगा 
सोच रहा हूं कब देगा


जीते जी मर जाऊं क्या 
जन्नत मुझको तब देगा


जिसने दी है ज़ीस्त हमें 
जीने का भी ढब देगा


बहुत भरोसा है जिस पर 
धोखा मुझको कब देगा


और किसी से मत मांगो 
ऊपर वाला सब देगा


होगी रहमत की बारिश 
वो गूंगे को लब देगा


कितनी ख़ुशियां दीं उसने 
ग़म का तुहफ़ा अब देगा



98210-82126 ….. devmanipandey@gmail.com

उसने मुझको हंसकर देखा : देवमणि पांडेय की ग़ज़ल



देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

उसने मुझको हंसकर देखा और तनिक शरमाई भी 

लूट लिया दिल शोख़ अदा ने वो मेरे मनभाई भी

पलक झपकते हुआ करिश्मा ख़ुशबू जागी आंखों में 

साथ हमारे महक उठी है आज बहुत पुरवाई भी

ये रिश्ता है नाज़ुक रिश्ता इसके हैं आदाब अलग 

ख़्वाब उसी के देख रहा हूँ जिसने नींद उड़ाई भी

छलनी दिल को जैसे तैसे हमने आख़िर रफ़ू किया 

मगर अभी तक कुछ ज़ख़्मों की बाक़ी है तुरपाई भी

प्यार-मुहब्बत की राहों पर सोच समझकर पांव रखो 

परछाईं बनकर चलती है साथ-साथ रुसवाई भी

उसकी यादों की ख़ुशबू से दिल कुछ यूं आबाद रहा 

मैं भी ख़ुश हूं मेरे घर में और मेरी तनहाई भी



98210-82126 ….. devmanipandey@gmail.com

Wednesday, January 25, 2017

परवाज़ की तलब : देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल




देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 
परवाज़ की तलब है अगर आसमान में
ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में

मोबाइलों से खेलते बच्चों को क्या पता
बैठे हैं क्यूँ उदास खिलौने दुकान में

ये धूप चाहती है कि कुछ गुफ़्तगू करे
आने तो दीजिए उसे अपने मकान में

लफ़्ज़ों से आप लीजिए मत पत्थरों का काम
थोड़ी मिठास घोलिए अपनी ज़ुबान में

जो कुछ मुझे मिला है वो मेहनत से ही मिला
मैं ख़ुश बड़ा हूँ दोस्तो छोटे उजड़े मकान में

हम सबके सामने जिसे अपना तो कह सकें
क्या हमको वो मिलेगा कभी इस जहान में

उससे बिछड़के ऐसा लगा जान ही गई
वो आया जान आ गई है फिर से जान में


M : 98210-82126 ….. devmanipandey@gmail.com